अंधियारी गली के किनारे खडे
एक लैंप पोस्ट पर टंगी हुई
डाक पेटी में -
हररोज डाला करता हूँ मैं -
एक ख़त।
मेरा ख़त अन्दर जाते ही
डाक पेटी के बदन में सिहरन
उठती है,
न जाने क्यों ?
एक दिन मैंने पूछा -
“तू क्यों सिहर उठती हो
मेरे ख़त डालने पर ?”
बोली -
” उत्तर न मिलने पर भी
ख़त डाले जा रहे हो ! -
सिहर न उठू तो क्या करूं ?
तूने मुझे वन वे जो बना रखा है ।”