Posted by: vijaykumardave | October 17, 2007

तीन कविताएं

तीन कविताएं(१)

मेरी आंखों में उमडते हुए समंदर की हरएक बुंद में
तेरी तस्वीर बंद है .

तेरी हरएक तस्वीर को मैं झांका करता हूं
चोरी-चोरी, चूपके-चूपके ।

मेरे होठों पर कई दिनों से
तितली बैठने नहीं आयी ।

मेरी आंखों में कई दिनों से
एक कटी-पतंग उड रही है ।

मेरे कानों में निरव स्वर ने
झंकार देना छोड दिया है ।

मेरी अंगूलियों ने स्पर्श संवेदना
गंवा दी है ।

मैं एक बुत-सा बन गया हूं -

मुझे पारसमणि की तलाश है ।

तुम कब आओगी ?

(२)

तुम कब आओगी ?

रात के अंधेरों ने
मुझे बिस्तर पर तडपते हुए देखा है ।

कभी-कभार खुली आंखें
सपना देख रही होती है ।

बगल में रहे पेड के पत्तों की खडखडाहट
झांका करती है ,
मेरे बिस्तर पर , जो मेरे जिस्म से
भरा पडा होता है ।

चूपके-चूपके याद दस्तक दे जाती है
मेरे उद्विग्न मन के पट पर
और
उस रात मैं ज़िंदा जलाया जाता हूं
- उन यादों के हाथों , जो तेरे जाने के बाद आती है ।

मेरे कानों में तेरे अटहास की आवाज़
गुंज़ने लगती है .
उस दिन मेरा बिस्तर मुझे
मेरी आंखों के नीचे गिला हुआ मिलता है
फिर मैं अपने आपको पुछ बैठता हूं

तुम कब आओगी ?

(३)

तुम आओगी या नहीं ?

अध खुली आंखों मैं इंतज़ार ने
अभी-अभी टपकना शुरू किया है ।
टेबुल पर पडी किताब के पन्ने
छत पर लटके पंखे से उलटते रहते है ।
तुम आओगी या नहीं
यह मुझे नहीं पता
मगर
हररोज़ तुम्हारी याद सपनों में आकर
मुझे जागने को विवश कर देती है ।
कभी उत्तर मिलेगा या नहीं
कि
तुम आओगी या नहीं ?

क्षणिकायें

चार विचार, चार क्षणिकाओँ में

हमसफ़र

नश्वर दुनिया को छोडकर
चले जायें हम
किसी शाश्वत सत्य की शोध में
जो हम दोनों को
बांधे हुए है
पिछले कई जन्मों से…

—-

किसी नदी के किनारे बैठा था में
तुने आहिस्ते से मेरे बगल में
जगह बना ली।
हम देखते रहे …. उठती, ठहरती, रूकती, दौड़ती लहरों को।
शाम ढले चल दिए हम -
में उत्तर में तुम दक्षिण में।

—–

एक मोड पर हुई
एक छोटी सी मुलाक़ात के बाद
हम चल दिए साथ - साथ।
एक मोड पर आकर
तुमने धीरे से मेरा हाथ थाम लिया।

एक मोड पर
तुने कहा -
मुजे अब पूर्व की ओर जाना है।
तुम चल दिए.
मैं अकेला पश्चिम की ओर डूबने लगा।

—–

समंदर के किनारे
हम चने चबाते - चबाते
देख रहे थे “सन - सेट”।
सूर्य को क्षितिज को चुम्बन देते हुए देख
तुने धर दिया मेरे भाल पर
एक ठन्डा, हल्का सा चुम्बन।

आज भी अपने भाल पर
वही ओठों के “फिन्गर-प्रिन्ट” लिये
ढुँढता हूं तुम्हें
क्षितिज पर डूबते हुए
सूरज के उस पार।

तुम कहां ?

मेरे ब्लोग के गुजराती मुलाकातियों के लिये मैं यहां मेरे मार्गदर्शक मित्र कविवर श्री सुरेन्द्र कडिया जी की कुछ रचनाएं प्रस्तुत कर रहा हूं …

इन कविताओं पर आपका प्रतिभाव सादर निमंत्रित है…

श्री सुरेन्द्र कडिया जी से आप kadiya@sbs.co.in पर संपर्क कर सकते हैं …
ગઝલ
- સુરેન્દ્ર કડિયા

ફૂલોની ફરશ પર પસીનો ઠર્યો છે
કહે છે, હવાઓએ ઓચ્છવ કર્યો છે.

ફરી એની સામે અરીસો ધર્યો છે
ફરી એક તાજો સિતારો ખર્યો છે.

મુબારક હો સઘળું અખંડિત-અખંડિત
અમે શ્વાસનો સહેજ બખિયો ભર્યો છે.

હતો એક બુદ બુદ અહંથી છકેલો
કહે, આખેઆખો સમંદર તર્યો છે.

કદી બંધ કરશો તો અંધારું થાશે
કિતાબોની વચ્ચે સૂરજ તરવર્યો છે.

(ગુજરાતી સામાયિક “નવનીત સમર્પણ”ના ઓગસ્ટ - ૨૦૦૭ના અંક્માં પ્રકાશિત રચના)
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ગઝલ
- સુરેન્દ્ર કડિયા
અઢળક ઊંડે તળિયે બેઠા
અમે અમારા ફળિયે બેઠા

વત્તો-ઓછો ભેદ મળે તો
જળમાંથી ઝળહળિયે બેઠા

શબદ-શબદની માયા બાંધી
કાગા થઈ કાગળિયે બેઠા

શબરી એંઠાં બોર ધરાવે
અનહદ-ફળના ઠળિયે બેઠા

નવલખ તારા ઠોલી થાક્યા
પછી તમારા નળિયે બેઠા

(ગુજરાતી સામાયિક “નવનીત સમર્પણ”ના ઓગસ્ટ - ૨૦૦૭ના અંક્માં પ્રકાશિત રચના)

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Posted by: vijaykumardave | July 27, 2007

समंदर में

कभी कस्ती, कभी तूफ़ां, कभी लहरें समंदर में;
कई यादें, कई आंसू, कई चहरे समंदर में.

वहां था पानी ही पानी, नहीं शबनम की दो बुंदें;
अरे! आश्चर्य! कोई दे रहा पहरे समंदर में.

मत छेड तू उसको, वह पीछे पीछे दौडेगा;
अरे! ओ डूब जाने के कई खतरे समंदर में.

कितनी सदियों से वह चुपचाप है बैठा;
न जाने कौन है जो है, इतने गहरे समंदर में.

अभी तो सिर्फ़ छुआ था, मुझे वह मेरे बिस्तर पर;
तभी से दौडती है उठती हुई लहरें समंदर में.

Posted by: vijaykumardave | July 6, 2007

डाक पेटी की सिहरन

अंधियारी गली के किनारे खडे
एक लैंप पोस्ट पर टंगी हुई
डाक पेटी में -

हररोज डाला करता हूँ मैं -
एक ख़त।

मेरा ख़त अन्दर जाते ही
डाक पेटी के बदन में सिहरन
उठती है,
न जाने क्यों ?

एक दिन मैंने पूछा -
“तू क्यों सिहर उठती हो
मेरे ख़त डालने पर ?”

बोली -
” उत्तर न मिलने पर भी
ख़त डाले जा रहे हो ! -
सिहर न उठू तो क्या करूं ?
तूने मुझे वन वे जो बना रखा है ।”

Posted by: vijaykumardave | July 6, 2007

बिदाई पर

कभी कभार
एक लम्हा
छूट जाता है हमारे पीछे ही
दीवारों पर लिखा तो
मिटा सकते हैं हम
लेकिन
दीवारों के जिस्म में लिखा
कहॉ पोछ सकते हैं कभी !

Posted by: vijaykumardave | June 15, 2007

आओ चले कहीं दूर

AÉAÉå cÉsÉå MüWûÏÇ SÕU

cÉsÉå xÉmÉlÉÉåÇ Måü aÉÉÇuÉ qÉåÇ 

ZÉåsÉåÇ cÉsÉÉå WûÉjÉ mÉMüQûMüU

fÉUlÉÉåÇ MüÐ qÉxiÉÏ xÉå

bÉÔqÉåÇ cÉsÉÉå xÉÉjÉ cÉsÉMüU

mÉWûÉQûÉåÇ MüÐ oÉxiÉÏ qÉåÇ

uÉÉÌSrÉÉåÇ MüÉå WûqÉ cÉÔqÉåÇ

cÉsÉÉå xÉÉjÉ oÉÉaÉÉåÇ qÉåÇ

AÉAÉå cÉsÉå MüWûÏÇ SÕU

cÉsÉå xÉmÉlÉÉå Måü aÉÉÇuÉ qÉåÇ 

iÉÔ eÉÉå xÉÉjÉ cÉsÉ Så qÉåUå

cÉsÉ SåÇaÉÏ rÉå UÉWåÇû

iÉÔ eÉÉå UWåû mÉÉxÉ qÉåUå

ÎZÉsÉ EPåÇûaÉÏ oÉWûÉUåÇ

QûÉsÉå WûqÉ QåûUÉ iÉåUÏ

lÉeÉUÉåÇ MüÐ NûÉÇuÉ qÉåÇ

AÉAÉå cÉsÉå MüWûÏÇ SÕU

cÉsÉå xÉmÉlÉÉåÇ Måü aÉÉÇuÉ qÉåÇ

आज दिनांक ०२ मई को सर पी. पी. ईन्स्टीट्युट ऑफ सायंस के प्राध्याप्क श्री सुभाष मेहता साहब ने रात ०८.०० बजे भावनगर के सुप्रसिद्ध मंदिर तख्तेश्वर महादेव मंदिर के प्रांगण में आकाश दर्शन कार्यक्रम द्वारा लोगों को भावनगर के नभोमंडल की जानकारी देने का स्तुत्य कार्यक्रम आयोजित किया. ईस कार्यक्रम के माध्यम से प्रा. श्री मेहता ने उपस्थित लोगों को खगोलशात्र की बारिकियां समझाते हुए हमारे पुराणों में उसे रसपूर्ण रीति से सामान्यजनों को कैसे ग्यान दिया जाता था उस बारे में सरल भाषा में जानकारी उपलब्ध करवाई. ईस कार्यक्रम में बच्चे, युवाओं और सज्जन और सन्नारियां उपस्थित रहे.

Posted by: vijaykumardave | April 26, 2006

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